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50 लाख काली मौते "Black Death", Plague History World History 

50 लाख काली मौते “Black Death”, Plague History

अगर जानवर कुछ गलती करते है तब हम इंसान उस जानवर को कैसे भी करके पकड़कर या तो उसे मार देते है या पकड़कर एक पिंजरे में कैद कर लेते है। क्यों? क्योकि उस जानवर ने कुछ गलती की थी जो इंसानो की नजर में एक पाप है और उसकी सजा उस जानवर को भुगतनी पड़ी।

अब सवाल ये है कि जब इंसान कोई गलती करता है या कुछ पाप करता है तब उसको भी सजा मिलनी चाहिए ना? तब इंसानो को कौन सजा देता है? इंसानो को सजा देती है कुदरत।

जी हां, कुदरत का कहर इंसानो को सजा देती है। जब इंसानो के पाप बढ़ जाते है ना तब कुदरत को मजबूरन इंसानो के बिच आना पड़ता है और उस पर रोक लगानी पड़ती है और हम सब जानते है कि जब जब दुनिया में लोगो के पाप बढ़ जाते है तब तब दुनिया में महामारी आई थी जिनमे से एक महामारी के बारे में हम आज बात करेगे, जिसका नाम था “काली मौते (Black Death-Plague)”

50 लाख काली मौते

व्यापारीयो के 12 जहाज लंबे समय से काले समुन्द्र में यात्रा पर गए थे जो कुछ ओक्टुबर 1347 में यूरोप के मैसिना शहर की सिसिली बंदरगाह पर वापस लौटे थे। समुद्र किनारे पर जो लोग नाविकों के स्वागत के लिए खड़े थे वे सब बड़े आचार्य के साथ जहाज के नाविकों से मिल रहे थे क्योकि जहाजो में ज्यादातर नाविक मर चुके थे।

जितने नाविक जिन्दा थे वे सब बुरी तरह से बीमार थे और सबके शरीर पर अजीब तरह के काले रंग के फोड़े थे जिनमे खून और मवाद उबल रहा था। नाविकों के शरीर पर यह अजीबो गरीब फोड़े देखकर सिसिली के अधिकारियो ने सभी जहाजो को बंदरगाह से बहार जाने का आदेश दे दिया पर अफ़सोस, तब बहुत देर हो चुकी थी।

दुनिया में इससे पहले ऐसी बीमारी किसी ने भी नहीं देखि थी इस वजह से इस बीमारी को “काली मौत” का नाम दिया, पर लोगो को कहा पता था कि ये तो अभी शुरुआत है।

एक इटालियन कवी ने उन दिनों लिखा था कि यह रोग इंसान के शरीर पर सेब के आकर के या अंडे जितने बड़े तो कुछ उससे छोटे फोड़े बनते थे, उन काले फोड़ो की शुरुआत या तो कमर के निचे से या काख के निचे से होती थी। खून और मवाद के काले फोड़ो की वजह से पहले बुखार आता था, फिर ठंड, फिर खतरनाक दस्त और भयानक दर्द के बाद मौत। रोग इतना खतरनाक था कि एक स्वस्थ इंसान रात को सोया है वो सुबह मरा हुआ मिलता था।

 

1348 तक यह रोग फैलता हुआ लंडन, पेरिस, बोर्डो और ल्योन तक पहुच गया। डॉक्टरों ने मरीजो को देखने से ही इंकार कर दिया, पुजारी ने अंतिम संस्कार करने से मना कर दिया, दुकानदारो ने दुकाने बंध करदी। गांव के लोग शहरो की तरफ भागने लगे पर फिर भी वे सब इस रोग से नहीं बच पाए। कई लोग रोग से बचने के लिए अपने बीमार और मरे हुए परिवारों को छोड़कर भाग गए थे उसके बाउजूद भी वो नहीं बच पाए। पालतू जानवर भेड़, बकरी जैसे कई जानवर भी इसकी लपेट में आ गए थे।

वहां की कुल आबादी में से कुछ 40 % लोग मर चुके थे। 1350 तक में वो स्पेन, इंग्लैंड, नॉर्वे, रशिया और इंडिया तक पहुच गया। सबसे ज्यादा यूरोप में 25 लाख लोग और उसके साथ एशिया और अफ्रीका में भी 25 लाख लोग ओर मर चुके थे।

उसके बाद ऐसा लगा की प्लेग रोग हमेशा के लिए चला गया, पर नहीं। 1665-1666 में वोही रोग फिर से लंडन में आया, जिसमे लंडन के 1 लाख लोगो की मौत हो गई। उसके बाद 1896-1900 में वो चाइना, इंडिया और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशो में फिर से सामने आया था।

 

फ्रेंच के एलेक्जेन्ड़र यरसिन ने 19 वी सदी के अंत में इस बीमारी का पता लगाया कि यह रोग बेसिलस पेस्टिस कीटों के माध्यम से फैला था जो एक इंसान से दूसरे इंसान तक हवा के माध्यम से फैलता है। बेलिसस पेस्टिस किटें आज भी यूरोप में हर जगह पाया जाता है।

आधुनिक युग ने स्वास्थ्य क्षेत्र में बहुत प्रगति की है और कई बीमारियों को कम कर दिया है पर प्लेग ऐसा रोग है जो सदियो से चलता आ रहा है और जब भी आता है तब पूरी मानवजाति को तहस महस कर देता है। प्लेग के किटानू आज भी दुनिया में कई जगहों पर पाए जाते है, पर हम सब उम्मीद करते है कि आने वाले समय में वे वापस लौटकर न आये।

 

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जय हिन्द!

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