You are here
Wilma Rudolph True Story True Story 

जीरो में से हीरो, Wilma Rudolph True Story

विल्मा रुडोल्फ(Wilma-Rudolph), जिंदगी आपको तभी रोक सकती है जब आपका हौसला कम हो, अगर जिंदगी हौसलों से भरी हुई हो तो इंसान को कोई भी कमजोरी आगे बढ़ने से रोक नहीं सकती। अपने आत्मविश्वास से इंसान ऐसे ऐसे कारनामे कर सकता है, जो दूसरे लोगो की नजर में नामुमकिन होता है। अगर आप अपने आसपास नजर करेगे तो ऐसे कई इंसान मिलेंगे, जो अपने काम को पूरा करके सबको हैरान कर देते हैं और दुनिया देखती रह जाती है।

 
साल 1940 में अमरीका के टेनेसी प्रान्त में एक रेलवे कूली के घर में एक लड़की का जन्म हुआ था, जो उस घर का 19वा संतान था। जिसका नाम विल्मा रखा गया, वो एक गरीब परिवार था और साथ में अश्वेत परिवार भी। उन दिनों अमरीका में अश्वेत लोगों को दोयम दर्जे के इंसान माना जाता था और उनको सारी सहूलतें नहीं मिलती थी। उसकी माँ नोकरानी का काम करती थी जो घर-घर जाकर झाड़ू-पोछे लगाती थी और उसके पिता कुली का काम करते थे।
विल्मा जैसे जैसे बड़ी होती जा रही थी वैसे वैसे उसके पैर में दर्द बढ़ता जा रहा था। जब उसका इलाज किया गया तब पता चला की विल्मा को पोलियो हुआ है और उस वक्त उसकी उम्र कुछ 4 साल थी जब उसे लकवा भी हो गया। डॉक्टरों ने साफ साफ कह दिया कि विल्मा अब कभी भी जमीन पर पैर नहीं रख पायेगी और उसके बाद वो केपिलर्स के सहारे उठती बैठती थी। 
 
जब तक विल्मा 9 साल की हुई तब तक तो डॉक्टरों ने जो कहा था वो सच निकला पर उसके बाद समय बदला। हर इंसान के अंदर आत्मविश्वास नाम का एक बीज होता है जो कभी न कभी फूटता है, वोही आत्मविश्वास का बीज विल्मा के अंदर फूटा उस वक्त और उसने अपनी माँ से कहा कि “माँ, में क्या कर सकती हु चलने के अलावा?”
 
जवाब उनकी माँ ने कहा कि “बेटी तुम जो चाहो वो कर सकती हो।”
 
विल्मा को एक सवाल परेशान करता आ रहा था कि क्या में चल सकती हु? दौड़ सकती हु? और यही सवाल उसने अपनी माँ से पूछा कि “तो क्या में दुनिया की सबसे तेज धावक बन सकती हु?”
 
“क्यों नहीं, तुम वो भी कर सकती हो।” उनकी माँ ने कहा क्योकि वो सकारात्मक और धार्मिक विचारधारा वाली महिला थी, माँ कि आशावादी बाते सुनकर विल्मा ने केपिलर्स उतार दिए और पहली बार बिना केलिपर्स के सहारे चलने की कोशिश की, शुरू शुरू में दिक्कत आई, गिर जाना, छोटी छोटी चोटे लगना यह सब हुआ पर उसने कभी किसी का सहारा नहीं लिया।

आखिर उसकी कोशिश रंग लायी। कुछ 2 साल बाद जब वो 11 साल कि हुयी, तब वो बिना किसी सहारे के चलने लगी। उनकी माँ ने यह बात डॉक्टर को बताई तब डॉक्टर उसे देखने के लिए विल्मा के घर आये, जब उन्होंने यह देखा, तो डॉक्टर के अंदर ख़ुशी की लहरें दौड़ाने लगी और उन्होंने विल्मा को प्रोत्साहित किया और उसका आत्मविश्वास बढ़ाया।

उसके बाद 13 साल की उम्र में उसने पहली बार दौड़ की स्पर्धा में भाग लिया और वो सबसे अंतिम स्थान पर आई। यह सिलसिला उसकी 8वीं स्पर्धा तक चला पर उसके बाद 9वीं स्पर्धा में वो पहली बार पहले स्थान पर आई और जीत की ख़ुशी को महसूस किया।

टेनेसी यूनिवर्सिटी में विल्मा की मुलाकात टेम्पल से हुई, जो उनके कोच थे। पहली बार जब दोनों के बिच बातचीत हुई तब टेम्पल ने विल्मा का आत्मविश्वास देखा, जिसे देखकर उन्होंने विल्मा की पूरी मदद की और दौड़ की हर तकनीक बारीकी से सिखाई। सामने विल्मा ने भी पूरी मेहनत की।

आखिर साल 1960 में विल्मा को ओलम्पिक में खेलने का मौका मिला, उस वक्त विल्मा का मुकाबला “जूता हेन” से था, उनकी खासियत ये थी आज तक उसे कोई हरा नहीं पाया था। सबसे पहले 100 मीटर की दौड़ हुई जिसमे विल्मा जित गई और सुवर्ण पदक हासिल किया। उसके बाद 200 मीटर की दौड़ हुई उसमे भी विल्मा ने जूता हेन को हरा दिया।

तीसरी दौड़ 400 मीटर की रिले रेस थी और विल्मा का मुकाबला एक बार फिर जुत्ता से ही था। रिले में रेस का आखिरी हिस्सा टीम का सबसे तेज एथलीट ही दौड़ता है।विल्मा की टीम के तीन लोग रिले रेस के शुरूआती तीन हिस्से में दौड़े और आसानी से बेटन बदली। जब विल्मा के दौड़ने की बारी आई, उससे बेटन छूट गयी। लेकिन उसने गिरी हुई बेटन उठायी और मशीन की तरह तेजी से दौड़ी और हेन को तीसरी बार भी हरा दिया और अपना तीसरा गोल्ड मेडल जीता।

इस तरह विल्मा दौड़ की स्पर्धा में एक साथ तीन स्वर्ण पदक जितने वाली पहली अमरीकन अश्वेत महिला खिलाडी बनी। अखबारो ने उसे “ब्लैक गेजल” की का नाम दिया और यह बात इतिहास के पन्नों में हंमेशा के लिए दर्ज हो गयी कि एक लकवाग्रस्त लड़की साल 1960 की रोम ओलम्पिक में दुनिया की सबसे तेज धावक बनी।

उसके बाद विल्मा अश्वेत लोगो के लिए आदर्श बन गयीं। जब वो घर वापस लौटी तो घर पर एक भोजन समारोह का आयोजन किया गया था, जिसमें श्वेत और अश्वेत अमेरिकियों ने एक साथ हिस्सा लिया और खाना खाया, जो बड़ी ख़ुशी की बात थी उन दिनों।

 

 

आपका अभिप्राय जरूर दीजिये!

जय हिन्द!

Related posts

3 thoughts on “जीरो में से हीरो, Wilma Rudolph True Story

  1. utilOl

    What phrase… super

  2. Nirav Sutariya

    nice story.

Leave a Comment

14 Shares
Share13
+11
Tweet
Share
Pin
Stumble